अपने पे बीती…

दो दिन पहले घटी छोटी सी दुर्घटना का विवरण अपने इंदौरी भिया को बताते हुए…

अब क्या बताएं भिया,
आज तो जो फैले है कि पूछो मत,
सड़क पे ऐसे लोटे के उठे मत।

किसी भेरू के चक्कर में अपन भेरा गए,
और धरती माता की गौद में पेल के जा गिरे।

जैसे पोए पे जिरावन छिड़कता है,
वैसेज अपने पे धुला लिपट ग्या,
औंधा रगड़ ग्या, गौड़ा घिसड़ ग्या।

कोई पायलेट-गिरी नि कर्रे थे अपन,
बस शांति से घर के लिए निकल रिये थे।

कजन किसकी खटारा से तेल टपका,
उसपे अपनी रामप्यारी का पइयाँ रपटा।

फिर अब क्या भिया अपना तो बेलेन्स गया,
नि साथ में सूज-सम्पट भी गयी।

बाकि तो सब पेलेज बता दिया,
की केसा गिरा और क्या हुआ।

पर ये तो सुनो पेलवान,
बाद में अपन्ने क्या किया।

नि-नि करते दस-पंद्रा लोग देख रिये थे,
पर अपन खुदिज उठे और रामप्यारी उठई।

एक झाड़ की डाली चटकई,
भाटा उठाया ओर जां से तेल फैला वां पे टिकाया।

गोड़े की रगड़ी जीन्स चढ़ई,
और क्या फिर घर के लिए गाड़ी बढ़ई।

तब से अब तक बस लंगड़ा रिये है,
ओर कई बि नि जा पा रिये है।

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बचपन

बचपन, जाने कही खो गया है,
नटखट, जाकर कही सो गया है।
शांति तो नहीं है जीवन में उसके न होने से,
पर सन्नाटा जरुर हो गया है।

बचपन, जाने कही खो गया है…

बचपन, कितना सजीव था,
उत्साह से भरा बड़ा रंगीन था।
प्राणहीन तो नहीं है काया मेरी उसके न होने से,
पर उदासीन जरुर हो गयी है।

बचपन, जाने कही खो गया है…

बचपन, बहुत उत्सुक था,
रहस्योद्घाटन में अग्रणी था।
अज्ञात तो नहीं है जीवन उसके न होने से,
पर रहस्यमयी अवश्य हो गया है।

बचपन, जाने कही खो गया है…

बचपन, यह क्या तुझे हो गया है,
मजबूरी के बोझ में बिन खेले सो गया है।
उम्मीदों की गठरी का सिरहाना लिए,
नन्ही सी आँखों में सपने बड़े सजाकर सो गया है।

बचपन, जाने कही खो गया है,
नटखट, जाकर कही सो गया है।

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अब तो हमें जागना होगा

आँगन में ना नीम है, ना जाम, ना आम बचा
वो तो तुलसी माता है तो उनका इक क्यारा रखा
छोटी सी गोरैया गायब
उड़ते तोतो के झुण्ड भी गायब
कोयल की कुहू-कुहू लुप्त हो गयी
मौसम की भी घडी घुम गयी
कही सर्द है कही गर्म है
और नहीं तो सर्द-गर्म है
कही बरसता कही दहकता
हर कोई मौसम की मार को सहता
पहले तो ऐसा नहीं था होता
किसने आखिर दिया ये धोखा
जो बदल गये प्रकृति के नियम
पतझड़-बहार-बसंत और सावन
धरती तो अपनी आज भी वही है
जो मानवजाती के पहले से सधी है
हमने ही कुछ ऐसा किया है
जो इस प्रकृति को बदला है
अभी तो और कई पीढ़ियाँ आनी है
क्या कुछ उनके लिए बचना बाकि है
क्या देंगे हम उन्हें आने वाले कल में
क्या संसार रहेगा जैसा था बीते कल में
पहले पानी भरी काली घटा होती थीं
सुकून से भरी हवा बहती थी
पर आज धुँए से सनी ज़हरीली हो गयी है
अब तो हमें जागना होगा
जो बिगड़ा सुधारना होगा
प्रकृति का संतुलन बनाना होगा
फिर एक पेड़ लगाना होगा
अब तो हमें जागना होगा…

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।। जय सियाराम – जय सियाराम ।।

जिन शब्दों का उच्चारण किसी निःशक्त मनुष्य के लिए ऊर्जा का स्त्रोत होता है, वही आज के समय में भगवान के नाम का स्मरण-भक्ति न रह कर अन्य कई रूपो का प्रर्याय बन गया है। समाज की संकीर्ण और कुंठित सोंच के कारण भगवान की भक्ति को मानस ने विभाजन का सूत्र बना दिया है।
यह विड़ंबना ही है की जन-जन को जोड़ने व सम बनाने वाली आस्था ही उनके बिच कटुता का कारण बन गयी है। उन्ही में से कुछ कुसंगतियो को अपनी इन पंक्तियों में उल्लेखित किया है, आशा है कि मैं आप तक अपनी भावना पंहुचा पाया हूँ।

थम गया चक्का, लग गया जाम,
चलती गाड़ी, ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

सीधे-सच्चे है बदनाम,
झूठो को पूजा, ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

चुनाव में जीते गुंडे-बलवान,
लूट के ले गये, ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

चलते-फिरते एक ही काम,
स्वार्थ हो पूरा, ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

खाते-पीते सुबहो-शाम,
सोचे उल्टा ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

ईश्वर अल्हा तेरे नाम,
फिर भी लड़ते, ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

भोले भाले सीता-राम,
बदनाम न कर यूँ ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

भक्त बनो जैसे हनुमान,
जग हित करते ले कर नाम,
जय सियाराम – जय सियाराम।

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यंत्र है या तंत्र?

मेरे मन में एक प्रश्न अधिकतर उठता रहता है के आखिर आज हम किस परिस्थिति में जीवन-यापन कर रहे है। जिन वस्तुओं का अविष्कार हमारी सुविधा के लिये हुआ, आज उन्ही के कारण जीवन दूभर हो गया है। मेरी यह कविता उसी प्रश्न से जुडी है।

​यंत्र है या तंत्र,
बाबा का कोई मन्त्र।

स्वतंत्र या परतंत्र,
लगा सारा जनतंत्र।

बुद्धिजीवी या गवार,
स्वस्थ या बीमार,
उलझा पूरा संसार।

कहने को तो बेतार,
पर जकड़े कोई तार।

नकद तो कभी उधार,
या मिले उपहार।

पल-पल का प्रपंच,
सर्प का विष-दंश।

समय का कंकाल,
जि का जंजाल।

सम्पर्क साधने का यंत्र,
सम्बंधों का षड़यंत्र।

यंत्र है या तंत्र,
बाबा का कोई मन्त्र।

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ऑटोवाले

​ऑटोवाले,
है काम तो आते,
पर काम बढ़ाते,
ये ऑटोवाले।

राह में चलते कब मुड़ जाते,
जैसे कोई हो मतवाले,
ये ऑटोवाले।

बिच सड़क पर विचरण करते,
जैसे बीहड़ में गजराज निराले,
ये ऑटोवाले।

कोई सवार जब भाव करे तो,
इतना ऊँचा दाम बताते,
जैसे स्वर्गलोक की सैर कराते,
ये ऑटोवाले।

मीटर से चलना भी नकारते,
आड़ा-टेड़ा मुह बनाते,
ये ऑटोवाले।

पर भीड़ भरे इस नूतन-वन में,
राहगीर को गंतव्य तक पहुचते,
ये ऑटोवाले।

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गर्जना है सिंह की…

गर्जना है सिंह की, यह सैन्य बल प्रमाण है।
शांति-दूत कृष्ण का स्वरुप शक्तिमान है।।

रण में राष्ट्रवीर के रक्त का उबाल है।
आतंक के अंत का अखण्ड अभियान है।।

गर्जना है सिंह की…

यह मात्र प्रतिशोध नहीं, शत्रु को पढ़ाया पाठ है।
धर्म युद्ध-यज्ञ में आहुति के स
मान है।

गर्जना है सिंह की…

सयंम की परास का यह अंतिम विराम है।
मातृभूमि की रक्षा का प्रण लिया अविराम है।

गर्जना है सिंह की, यह सैन्य बल प्रमाण है।
शांति-दूत कृष्ण का स्वरुप शक्तिमान है।।

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