क्या हम स्वाधीन है?

हमारे 68वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, राष्ट्र की यथास्थिति स्वयं से यह प्रश्न करने को विवश कर रही हैं। जिस प्रकार की अशांति, अराजकता व्याप्त है वह हमारे स्वाधीन होने पर प्रश्न उठा रहे हैं।

प्रजा बड़ी प्राचीन है,
प्रभाव के अधीन है,
विचार भी मलिन है,
कर्म कर्तव्यहीन है,
क्या हम स्वाधीन है?

प्रश्न बहुत गंभीर है,
उत्तर मात्र प्रतीक है,
प्रमाण दिन-हीन है,
सजीव भी निर्जीव है,
क्या हम स्वाधीन है?

आसुरी प्रवर्ति प्रधान है,
दमन के कीर्तिमान है,
स्वार्थ सिद्धि संग्राम है,
भोगतंत्र में विलीन है,
क्या हम स्वाधीन है?

प्रचंड कर्मकांड है,
अखंड संविधान है,
अचल दंडविधान है,
फिर भी भय व्याप्त है,
क्या हम स्वाधीन है?

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यादें

मैं भूला तो नहीं, पर याद नहीं रहता,
वक़्त की धूल से सब साफ नहीं दिखता।

धुंधली सी झलक आती है आँखों के सामने,
बस वक़्त का तकाज़ा ध्यान नहीं रहता।

यादों की तस्वीरों में वक़्त की दिमग लगी है,
उन पलो की बारीकियों का अंदाजा नही रहता।

यूँ तो हर पल सहेज कर रखा था दामन में
पर मौके पर खोजने से भी नहीं मिलता।

कसक सी उठती हैं इस बेबसी के आलम में,
मेरा आज ही अपने कल को नहीं जानता।

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दरख़्त

मैं दरख़्त हुँ,
इसलिए सख्त हुँ।
जड़ नही जड़ों से जुड़ा हुआ,
ज़मीन पर खड़ा हुँ।
कोपल से फट कर,
आकाश की और बढ़ता हुँ।
मैं खोखला नही,
समय के साथ ठोस बना हुँ।
हर परिस्थिति से,
लड़ कर खड़ा हुँ।
कभी दबा नही,
तूफानों में भी अडिग रहा हुँ।
किसी को देख कर नही,
सह कर सीखा हुँ।
हर पतझड़ में,
सुख कर बिखरा हुँ।
फिर बसंत में,
जुड़ कर निखरा हुँ।

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दोस्त

अब दोस्तों के बारे में क्या बताये, बस इतना ही कह सकता हुँ कि दोस्त जैसे भी हो दोस्त होते है। यह कविता अपने सभी दोस्तों को समर्पित करता हुँ क्योंकि मैं भी उन्ही का दोस्त हुँ। :p

हर दोस्त अपनी जिंदगी में व्यस्त है,
किसी न किसी को ज़ुकाम, बुखार या दस्त है,
कोई खुद-की या दोस्त-की दोस्त से त्रस्त है,
फिर भी हर कमीना बड़ा मस्त है,
पुछो मत, मेरे दोस्तों के किस्से जबरदस्त है,
कई प्रचलित, तो कुछ छुपे रहस्य है,
कांड तो जैसे इन्हें करने अवश्य है,
करता कोई एक पर भरते समस्त है,
अपनी-अपनी विधा में हर कोई दक्ष है,
हर एक का अपना निश्चित लक्ष्य है,
कोई उसके निकट या उस पर पदस्थ है,
तभी तो हर दोस्त, व्यस्त किन्तु मस्त है।

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चिंतन

कभी कही ऐसे ही बैठे-बैठे जीवन के प्रश्न पर चिंतन-मनन करते हुए कुछ विचार इसप्रकार आये –

लड्डू से नुक्ती बटने तक बंधा हुआ क्यूं जीवन सारा?
जनम-मरण के चक्र में उलझा, इससे ऊपर उठ ना पाया।

मन समाज के छंद में जकड़ा, तन लिहाज से अकड़ा।
लक्ष्य बनाए धनार्जन के, ज्ञान ना जोड़ा तिनका।

कर्म किये सब फल की चाह में, फल ना भाया कड़वा।
अंध हुई सब श्रद्धा-भक्ति, गहरी रूढ़ि-कुरीतियों की छाया।

हद हुई अब तो मिसाल की, ढोंगी-ठरकी बाबा।
क्या खूब लिखा संवाद किसी ने इनकी नियत को दर्शाता,
मेरे मन को भाया मैं कुत्ता काट के खाया।

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सड़क पार…

करनी मुझे सड़क थी पार,
चौपायों से भरा बाज़ार,
प्रियतम मेरी राह निहारे,
सौच-सौच रक्तचाप बढ़ाए,
कब आएंगे वो इस पार,

चितकबरी धारी वाली पट्टी पर,
बहुत किया फिर सौच विचार,
कैसे करूँ इस सड़क को पार,
करता रहा मैं अथक प्रयास,

हाथ दिखा कर किया इशारा,
दृण इच्छा से कदम बढ़ाया,
वाहन चालक ने मुझे निहारा,
देख मुझे अपना वेग बढ़ाया,
चालक की त्वरित क्रिया पर,
प्रतिक्रिया में मैं घबराया,
लौटा कर कदम शुन्य पर,
जैसे-तैसे अपना जीवन बचाया,
वरना जाता परलोक सिधार,
करने में सड़क वो पार।

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गाँव

भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में किसीं गाँव का महत्व उतना ही होता है जितना कि इमारत के निर्माण में नींव का होता है। पर गाँवो कि यथास्थिति दयनीय है। उसी पर अपने मन के विचार इस कविता में लिखने का प्रयास किया है।

उस गाँव का क्या जो शहर में धस गया,
मैढ़ पर था अब बगल में फस गया,
शहर के बेतुके चोचलों में उलझ गया,
खुशहाल जमीन को बंजर में बदल दिया,
फसल की जगह इमारत उगल रहा,
पेड़ो की छांव से उजाड़ में ढ़ल गया,
जीवन दायीं वायु में ज़हर है घोल रहा,
विकास की आड़ में बदहाल हो गया,
कभी जो शहरों को जीवन देता था,
किसीं दुसरे गाँव पर आश्रित हो गया,
उस गाँव का क्या जो शहर में बदल गया।

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