मजदूर

1 मई, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जो लगभग एक सदी पहले से मनाया जा रहा है पर आज भी मजदूर की हालत जस की तस है। उसके अधिकारों के लिये कोई नही लड़ रहा। वह खुद परिस्थितियों से जूझ रहा है।

उसकी कुछ मजबूरियाँ जो मैंने महसूस की अपनी इन पंक्तियों में व्यक्त करने का प्रयास किया है

मजदूर, बड़ा मजबूर
दिहाड़ी के भरोसे रोटी दो जून*
हर सुबहा संशय से भरपूर
क्या आज मिलेगी
के सोएंगे बच्चे संग भूख

तत्पर करने को हर संभव काम
ढ़ोना हो बोझ
के खोदना हो पहाड़
किसीं भी तरह की मेहनत
उसके लिए जीवन की कसौटी है

सुनता हर किसी की
सिर्फ मेहनताने को देख
जो मिटाता बच्चो की भूख
कमाता चंद रुपये
आत्म-सम्मान अपना बैच
मजबूरी के सामने बिल्कुल चुप

मजदूर, बड़ा मजबूर
आसमानी छत के नीचे
तपती ज़मी का बिछोना
यही है उसका अपना घरोंदा
और समाज का व्यहवार ऐसा
की जैसे हो अछूत

मजबूरी भी बड़ी मजबूर
रोज लेती इम्तेहान
उसी का जो कल ही गुजरा
इन काटो भारी राहों से हुज़ूर
मजदूर, बड़ा मजबूर।

*दो जून -> दो वक्त।

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2 Responses to मजदूर

  1. devesh says:

    Best h

  2. Himanshu dongre says:

    “SAATY”……aaj bhi majdoor varg samaj ka aisa hissa hai jiske jivan or vikas ke liye vichar jaruri hai….
    Aapki soch or uske liye ye kadam sarahniy hai…..😊👌👍
    Unhe unki paristhitiyo se ubarne ke liye hum sirf koshish kar sakte hai or aapne in panktiyon ke through vo ki hai…😊
    I appriciate

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