बचपन

बचपन, जाने कही खो गया है,
नटखट, जाकर कही सो गया है।
शांति तो नहीं है जीवन में उसके न होने से,
पर सन्नाटा जरुर हो गया है।

बचपन, जाने कही खो गया है…

बचपन, कितना सजीव था,
उत्साह से भरा बड़ा रंगीन था।
प्राणहीन तो नहीं है काया मेरी उसके न होने से,
पर उदासीन जरुर हो गयी है।

बचपन, जाने कही खो गया है…

बचपन, बहुत उत्सुक था,
रहस्योद्घाटन में अग्रणी था।
अज्ञात तो नहीं है जीवन उसके न होने से,
पर रहस्यमयी अवश्य हो गया है।

बचपन, जाने कही खो गया है…

बचपन, यह क्या तुझे हो गया है,
मजबूरी के बोझ में बिन खेले सो गया है।
उम्मीदों की गठरी का सिरहाना लिए,
नन्ही सी आँखों में सपने बड़े सजाकर सो गया है।

बचपन, जाने कही खो गया है,
नटखट, जाकर कही सो गया है।

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2 Responses to बचपन

  1. Ek bar fir bahut hi sunder rachna jiyaji……
    Kal….aaj ….or kal ke bachpan ka ek sath samavesh….
    Sunder evam adbhut☺👍👌

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