प्रकृति

आज से करीब एक वर्ष पूर्व एक सोंधी सी सुबहा थी, कुछ छः-साड़े छः बजे की बात होगी (जो की मेरे लिये कतइ सामान्य नहीं होती :p)। मेरी कुंभकरण से प्रभावित नींद जाने कैसे खुल गयी और उस अद्भुत मौनसून के शुरवाती दौर की अविश्वसनीय सुबहा का साक्षी बना था। उस क्षण को मैंने अपनी इस कविता में सँजोया था, जो आज बहुत याद आ रहा है। उम्मीद है के आप भी इसे पढ़ कर उस सुबहा को उसी तरहा महसुस कर पाएंगे जिस तरहा मैं किया करता हूँ।

प्रकृति की छटा अमीट है,
नभ मे छायी घटा कई है,
चाँद गगन मे चढ़ा हुआ है,
मन-मोहक कितनी ये प्रभात है।

कर्ण-प्रिय नभचर का कलरव,
कल-कल कंचन सरिता का वैभव,
भोंर हुई तो भान हुआ है,
अनुपम कितना है ये अनुभव।

शीतल-निर्मल बह पवन रही है,
तरुवर उसमे झुम रहे है,
माटी की गंध है कितनी मोहक,
मनोरम कितनी है ये प्रकृति।

भानु भी अब नभ में शोभित,
चिर-निशा के अंत से मोहित,
अवनी पर है औस के मोती,
कितनी अनमोल है सुबहा नई ये।

औज है लायी संग ये अपने,
तेज है छाया फिर जीवन मे,
उर्जा प्रवाह है कितना विलक्षण,
अद्भुत कितनी ये सु-प्रभात है।

Advertisements
This entry was posted in Poetry and tagged , , . Bookmark the permalink.

2 Responses to प्रकृति

  1. beautiful word picture!
    takes me back in time when usually woke up to such picturesque mornings.
    craving for it now when view of sky is interrupted by grills. Sigh!

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s