मैंने देखा है…

नज़रिया बदलते देर नहीं लगती,
मैंने इंसा को बदलते देखा है ।

सांसो की आहट जाने कब थम जाये,
मैंने तुफानो को थमते देखा है ।

उम्मीदें बिखरते देर नहीं लगती,
मैंने ख्वाबो को टूटते देखा है ।

गुलज़ार से वीरान हो जाते है बागीचे,
मैंने बसंत को पतझड़ में ढलते देखा है ।

मिल्कियत बदलते देर नहीं लगती
मैंने राजा को रंक होते देखा है ।

नशा चड़ने को इक जाम काफी है,
मैंने हुस्न को गुरुर में बदलते देखा है ।

गुरुर चूर होने में देर नहीं लगती,
मैंने चढ़ते सूरज को उतरते देखा है ।

चंद लफ्ज़ो में बन जाती है बातें,
मैंने ख़ामोशी में कोहराम होते देखा है ।

बातें बिगड़ते देर नहीं लगती,
मैंने दौस्तो को दुश्मन बनते देखा है ।

इक खरौच से ही लहू निकल आता है,
मैंने इसे पानी की तरह बहते देखा है ।

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3 Responses to मैंने देखा है…

  1. monika says:

    चंद लफ्ज़ो में बन जाती है बातें,
    मैंने ख़ामोशी में कोहराम होते देखा है ।

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