गाँव

भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में किसीं गाँव का महत्व उतना ही होता है जितना कि इमारत के निर्माण में नींव का होता है। पर गाँवो कि यथास्थिति दयनीय है। उसी पर अपने मन के विचार इस कविता में लिखने का प्रयास किया है।

उस गाँव का क्या जो शहर में धस गया,
मैढ़ पर था अब बगल में फस गया,
शहर के बेतुके चोचलों में उलझ गया,
खुशहाल जमीन को बंजर में बदल दिया,
फसल की जगह इमारत उगल रहा,
पेड़ो की छांव से उजाड़ में ढ़ल गया,
जीवन दायीं वायु में ज़हर है घोल रहा,
विकास की आड़ में बदहाल हो गया,
कभी जो शहरों को जीवन देता था,
किसीं दुसरे गाँव पर आश्रित हो गया,
उस गाँव का क्या जो शहर में बदल गया।

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हिंदी भाषी

अभी कुछ दिनों पहले हमारी राज-भाष के स्मरण में ‘हिंदी दिवस’ धूमधाम से सार्वजनिक माध्यमों (सोशल मीडिया) पर मनाया गया। कई लोगों के लिए जो मात्र राज-भाषा है, मेरे लिए वही मातृ-भाषा है। और जिस प्रकार से हिंदी भाषी अधूरे भाषा ज्ञान के साथ शुभकामनाएं प्रेषित कर रहे थे, उन्हें पढ़ कर कुछ इस प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त होती है।

भाषा अपनी भ्रष्ट हो गयी,
हिंदी उर्दू की खिचड़ी खाकर,
बन-ठन कर बाजार में निकली,
ओढ़े फटी अंग्रेजी चादर,
बोली का पैबंद लगा है,
लहजा उधड़ी धोती,
पहने समझ की कुतरी टोपी,
खुद के बोलो पर इतरा कर,
बलखाते हिंदी भाषी।

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ग्रहण

पूर्णिमा के चंद्र पर ग्रहण की छाया
अमावस की भांति अंधकार सा छाया

चंद्र ग्रहण सम सूर्य ग्रहण भी आया
रक्त-तप्त पर क्षणिक शीतल छाया

अंधविश्वास भी खूब निभाया
सूतक-सुदगाल, संकट का साया
अन्न-जल उस क्षण वर्जित माना
अशुद्ध सिद्ध नित्य-कर्म कर डाला

अद्भुत-अलौकिक खगोलीय घटना
अदृश्य-दृश्य विस्मयी संघटना
जीवनकाल की विलक्षण घटना
रूढ़ियों के चक्र में जिसे गवाया

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रेल यात्रा

पिछले दिनों एक लंबी रेल यात्रा का अनुभव किया जिसने कुछ पंक्तियों को लिखने के लिए प्रेरित किया।

भाती-भाती के लोग है आते,
भिन्न-भिन्न व्यहवार दिखाते,
कोई थोड़ा घुल-मिल जाते,
या फिर अलग-थलग हो जाते,
धड़क-धड़क स्टेशन आते,
कुछ नये जुड़ते,
कुछ बिछड़ जाते,
मिल-जुल कर सब समय घटाते,
इक-दूजे का ज्ञान बढ़ाते,
हँसी ठहाके खूब लगाते,
खिल-खिल खिल-खिल दांत दिखाते,
मिल-बांट कर पीते-खाते,
पूरी यात्रा धूम-मचाते।

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देसी-विदेशी

देश मे देसी कहा बचे हैं,
घोर विदेशी बने हुए हैं,
खोज में देसी उत्पादों की,
यंत्र विदेशी ले घूम रहे हैं।

डॉलर बन गया चना था देसी,
स्वीट-कॉर्न हो गया भुट्टा देसी,
नस्ल विदेशी फसल विदेशी,
देश की मिट्टी उगले विदेशी,

लज्जा आती इनको इतनी,
जब कोई कह दे इन्हें स्वदेशी,
अंग है देसी, रंग भी देसी,
फिर भी फिरते बने विदेशी,
झुंड में घूमते हुए मवेशी,
भेद का गौरा रंग निवेशी,
अप्रवासी अक्ल हितेषी,
खोये होश नशे में विदेशी,
हाय विदेशी हाय विदेशी।

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गृहस्त

अपने घर से दूर रहने वाले दंपतियों में से जब पत्नी गृहनगर जाती है तब कुछ पतियों की दशा/दुर्दशा को उन्ही के भावों में सहेजती हुई यह रचना प्रस्तुत है। यह संभव हैं की कई पति इन बातों से भावुक हो जाए और शीघ्र-अतिशीघ्र अपनी अर्धांगिनी को पुनः घर ले आये। किसी भी परिस्थिति में मैं पाठक को स्वविवेक से निर्णय लेने का आग्रह करूँगा। वे अपने निर्णय के स्वयं जिम्मेदार है, उसमे मेरी इस रचना का प्रभाव मात्र एक संयोंग ही होगा।

गृहस्ती के अभ्यस्त नर,
जब क्षणिक वैराग्य को पाते है,
प्रेम पूर्ण आग्रह से वंचित,
विरह व्यथा विकारी हो जाते है,
अन्न-जल की त्राहि में,
पार्टी प्रिय प्राणी बन जाते है,
आलस्य के आलिंगन में,
पल-पल धसते जाते है,
देर तक सोते देर से जागाते,
काम से भी देर से आते है,
सामान्य नियमित दिनचर्या भी,
असहज रूप से निभाते है,
मैले-कुचैले वस्त्र-अंगोछे,
अस्त-व्यस्त ग्रहदशा हो जाती है,
विवाहित होते हुए भी,
छटे-कुँवारे कहलाते है,
गृहस्ती के अभ्यस्त नर,
जब क्षणिक वैराग्य को पाते है।

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कहानी

जब कभी हम कोई कहानी या उपन्यास पढ़ते है तो अक्सर अपने आप को उससे जुड़ा पाते है। किसी चरित्र या पात्र से स्वयं के साथ समानता देखने या ढूंढने लगते है। ये मेरा अपना अनुभव तो नही पर कुछ किताबें पढ़ने वाले मित्रों द्वारा साझा किये गये विचार इन पंक्तियों में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

क्या यह कहानी मेरी है?
जो किसीं ने कागज़ पर स्याही से उकेरी है।
मैंने पूरी पढ़ी तो नहीं,
पर प्रस्तावना तो बिलकुल मेरी है।

क्या यह भी है उलझी पहेली?
जो लगती तो सीधी-सच्ची सहेली।
क्या इसमें भी है किस्से वैसे,
मेरी जिंदगी के जो हिस्से है?
क्या यह मेरा अतीत है,
या फिर संजोये है भविष्य?

आखिर है किसकी कहानी,
क्यूँ लग रही इतनी घनिष्ट,
किसने गड़ी है मेरी कहानी,
क्यूँ चलाई अपनी कलम?

इसमें है क्या अंत मेरा,
या होगी शुरवात नयी?
क्या होगा कल सवेरा,
या अमावस रात वही?

मुझे जानता है क्या लेखक,
या नही वो मुझसे अलग?
क्या गुज़री है उस पर भी,
जो मैंने भी ज़िंदगी में सही?

कैसे वो किरदार,
मेरे अनुभव से सीख लेता है?
मुझे उसकी आँखों से,
गलती करते देख लेता है?

मैं मूक रह जाता हुँ,
जब कभी दोहराता वही कर्म।
अपने आप मे लजाता,
खुद को बदलने में लग जाता हूँ।

बचपन मे पढ़ा था,
कहानी से हमे शिक्षा मिलती है।
जो शिक्षा दे कहानी वही है।

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