रहते थे

रहते थे अकड़ में हम भी बड़े,
बस उम्र थी छोटी काम बड़े।

बारूद पर चढ़ कर खेल किए,
लिये आँख में शोले चिंगारी भरे।

रहते थे अकड़ में…

देते थे पलट कर चार सुना,
कोई जो टोंके एक दफा।
होते थे किस्से रफा-दफा,
एक पल में अपनी आँख दिखा।

रहते थे अकड़ में…

सीधे मसले उलझाते थे,
उल्टे रास्ते ही जाते थे।
बे-मतलब उखड़े जाते थे,
बस अकड़ में ही इतराते थे।

रहते थे अकड़ में…

पर जैसे-जैसे ये उम्र बड़ी,
अकड़ की रस्सी खुलती गई।
दहकते आँखों के शोले भी,
शर्म के पानी मे बुझ ही गए।

रहते थे अकड़ में…

जिनकी कभी एक ना सुनते थे,
अब उन्हें सुनने को तरसते है।
हर पल रहते है आँख झुका,
कि हो ना कोई और खता।

रहते थे अकड़ में…

उलझे किस्से सुलझाने में,
खुद दल-दल में धस जाते हैं।
अपने मन को बहलाते है,
हम वक़्त के हाथो मारे हैं।

रहते थे अकड़ में हम भी बड़े,
बस उम्र थी छोटी काम बड़े।

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मेंगई

भिया मेंगई की मार पे इंदौरी के विचार प्रस्तुत है

रस्ते के जो भाटे है,
दुनियाभर के घाटे है,
साले सब अपने ही माथे है!
कित्ता भी भले कमा लिया,
पर ढ़ेला भर नि बच पा रिया,
कुछ-बी समझ नि आ रिया,
कां-कां कित्ता उड़ा दिया,
नि उड़ते हवा में अपन,
रक्खे रखते जेब पे वजन,
फिर-बी माल कैसे खिसके जा रिया,
कई नि तो फोकट में टैक्स कटे जा रिया,
इस चक्कर मे अपन्ने बीमा सबका करा लिया,
उसकी किस्त अलग भरे जा रिया,
पर जेब में कुछ-बी नि बच पा रिया,
बजार में भी सब मेंगा आ रिया,
मेजिक वाला टेसन से रीगल के पन्द्रा मांग रिया,
छोरा दस के चार पानी-पतासे खिला रिया,
बिस का खोपरा-पेटिस चालीस में आ रिया,
पोए वाले भिया ने भी अपना भाव बड़ा दिया,
सेंव का पेकेट भी सो से कम में नि आ रिया,
दस की कट का गिलास छोटा हुए जा रिया,
भिया ऐसे में कोई इंदौरी कैसे जिए जा रिया!!

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रघुराई

सूखे समतल,
बीहड़ जंगल,
रिक्त कमण्डल,
निर्जल अंचल,
सहज-समझ लघु रघुराई

वात प्रदूषित,
ग्रास भी दूषित,
श्रवण अनुचित,
इन्द्रियाँ मुर्छित,
मरण है निश्चित रघुराई

छवि अभिमानी,
मति अज्ञानी,
कृति मनमानी,
फली जीवहानी,
गति जग-नाशी रघुराई

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मैंने सोचा

मैंने सोचा, आज से सोचना छोड़ते हैं
आखिर क्या होगा जो बिन सोचे कुछ करते हैं
जैसे कई नासमझ गर्व से अकड़ते
अपनी अक्ल की कमी पर कसीदे गढ़ते हैं
वैसे ही हम भी कुछ नासमझी करते
बिन सोचे, सोच-समझ से दुश्मनी करते हैं

शुरुआत तो अच्छी नहीं रही
बुरी आदत जो थी सोचने की,
उसने कसर रहने दी अभिव्यक्ति में
बिन सोचे-समझे कार्य करने की

बड़ी मुश्किल से सोच से दूरी हुई,
तभी समझ आई तकलीफ उन नादानों की
कैसीं कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेते हैं
सोच के प्रभाव से परे कैसे रहते हैं
यह आसान नहीं,
अपनी ही इन्द्रियों को मुर्छित कर पाना
सहज प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना
और उसकी जगह ब्राह्मण के बाहर की
अपने आप में अद्भुत
सोच रहित क्रिया का प्रदर्शन करना

उपहास-परिहास इस स्थिति का
सर्वोत्तम द्योतक है
बिन सौचे अट्टाहास करना
सोचने वाले कभी नहीं समझ सकते
वे परिणामों के प्रश्नों में उलझकर
इस परमानंद का अनुभव नहीं कर सकते

अब तक इतना सोच-सोच कर लगता हैं
पाया तो कुछ नही पर खोया बहुत कुछ हैं
और तो और शान्ति-चैन-सुकून
सभी मे भंग घोला हैं

आज तो खुद सोच भी सोच रही हैं
समझ के साथ सामंजस्य के चक्कर में
वो खुद कितनी अधूरी रह गई हैं

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उधार

बौझ उधार का बहुत भारी होता हैं,
ये जाकर उससे पुछो जो सच मे ढ़ोता हैं।
जो देकर उधार खुद भूल जाए,
वो उपकारी निर्मोही होता हैं।
और निःस्वार्थ दान जो देता,
वही करदाता होता हैं।
पर जो खुद किराये के शरीर में,
परजीवियों की भाति
राज-विलास का जीवन जीता हैं,
उधार के जीवन में कसमें तौड़ता
अपने अंत को न्योता देता है।
पर उसके कुकर्मो का फल
हर कोई पाता हैं।
दोष एक का तो दंड अनेकों को होता है।
हर बार दोषी भय मुक्त
और निर्दोष अपराधी होता है।
बौझ उधार का बहुत भारी होता हैं,
ये जाकर उससे पुछो जो सच मे ढ़ोता हैं।

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शिव

महा शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर सभी को शुभकामनाएं एवं संयम महाकाल के श्रीचरणों में यह रचना अर्पित करता हुँ।

शीश धरे शशि, जटा धरी गंगा,
सर्प सुशोभित सम सुमन माला,
भस्म रमाए चिर सन्यासी,
कंठ समाये विष विशम्भर,
तारी श्रष्टि बन दिगंबर,
तीन-लौक के तुम ही स्वामी,
लोभ-मोह से परे वैरागी,
दूर-सुदूर कैलाश विराजे,
कैलाशपति भोले-भंडारी,
निराकार शिव-शंकर शंभु,
महाकाल महादेव रामेश्वर,
ओमकार नटराज अविनाशी।

_/\_ जय महाकाल _/\_

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क्या हम स्वाधीन है?

हमारे 68वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, राष्ट्र की यथास्थिति स्वयं से यह प्रश्न करने को विवश कर रही हैं। जिस प्रकार की अशांति, अराजकता व्याप्त है वह हमारे स्वाधीन होने पर प्रश्न उठा रहे हैं।

प्रजा बड़ी प्राचीन है,
प्रभाव के अधीन है,
विचार भी मलिन है,
कर्म कर्तव्यहीन है,
क्या हम स्वाधीन है?

प्रश्न बहुत गंभीर है,
उत्तर मात्र प्रतीक है,
प्रमाण दिन-हीन है,
सजीव भी निर्जीव है,
क्या हम स्वाधीन है?

आसुरी प्रवर्ति प्रधान है,
दमन के कीर्तिमान है,
स्वार्थ सिद्धि संग्राम है,
भोगतंत्र में विलीन है,
क्या हम स्वाधीन है?

प्रचंड कर्मकांड है,
अखंड संविधान है,
अचल दंडविधान है,
फिर भी भय व्याप्त है,
क्या हम स्वाधीन है?

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