देसी-विदेशी

देश मे देसी कहा बचे हैं,
घोर विदेशी बने हुए हैं,
खोज में देसी उत्पादों की,
यंत्र विदेशी ले घूम रहे हैं।

डॉलर बन गया चना था देसी,
स्वीट-कॉर्न हो गया भुट्टा देसी,
नस्ल विदेशी फसल विदेशी,
देश की मिट्टी उगले विदेशी,

लज्जा आती इनको इतनी,
जब कोई कह दे इन्हें स्वदेशी,
अंग है देसी, रंग भी देसी,
फिर भी फिरते बने विदेशी,
झुंड में घूमते हुए मवेशी,
भेद का गौरा रंग निवेशी,
अप्रवासी अक्ल हितेषी,
खोये होश नशे में विदेशी,
हाय विदेशी हाय विदेशी।

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गृहस्त

अपने घर से दूर रहने वाले दंपतियों में से जब पत्नी गृहनगर जाती है तब कुछ पतियों की दशा/दुर्दशा को उन्ही के भावों में सहेजती हुई यह रचना प्रस्तुत है। यह संभव हैं की कई पति इन बातों से भावुक हो जाए और शीघ्र-अतिशीघ्र अपनी अर्धांगिनी को पुनः घर ले आये। किसी भी परिस्थिति में मैं पाठक को स्वविवेक से निर्णय लेने का आग्रह करूँगा। वे अपने निर्णय के स्वयं जिम्मेदार है, उसमे मेरी इस रचना का प्रभाव मात्र एक संयोंग ही होगा।

गृहस्ती के अभ्यस्त नर,
जब क्षणिक वैराग्य को पाते है,
प्रेम पूर्ण आग्रह से वंचित,
विरह व्यथा विकारी हो जाते है,
अन्न-जल की त्राहि में,
पार्टी प्रिय प्राणी बन जाते है,
आलस्य के आलिंगन में,
पल-पल धसते जाते है,
देर तक सोते देर से जागाते,
काम से भी देर से आते है,
सामान्य नियमित दिनचर्या भी,
असहज रूप से निभाते है,
मैले-कुचैले वस्त्र-अंगोछे,
अस्त-व्यस्त ग्रहदशा हो जाती है,
विवाहित होते हुए भी,
छटे-कुँवारे कहलाते है,
गृहस्ती के अभ्यस्त नर,
जब क्षणिक वैराग्य को पाते है।

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कहानी

जब कभी हम कोई कहानी या उपन्यास पढ़ते है तो अक्सर अपने आप को उससे जुड़ा पाते है। किसी चरित्र या पात्र से स्वयं के साथ समानता देखने या ढूंढने लगते है। ये मेरा अपना अनुभव तो नही पर कुछ किताबें पढ़ने वाले मित्रों द्वारा साझा किये गये विचार इन पंक्तियों में प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

क्या यह कहानी मेरी है?
जो किसीं ने कागज़ पर स्याही से उकेरी है।
मैंने पूरी पढ़ी तो नहीं,
पर प्रस्तावना तो बिलकुल मेरी है।

क्या यह भी है उलझी पहेली?
जो लगती तो सीधी-सच्ची सहेली।
क्या इसमें भी है किस्से वैसे,
मेरी जिंदगी के जो हिस्से है?
क्या यह मेरा अतीत है,
या फिर संजोये है भविष्य?

आखिर है किसकी कहानी,
क्यूँ लग रही इतनी घनिष्ट,
किसने गड़ी है मेरी कहानी,
क्यूँ चलाई अपनी कलम?

इसमें है क्या अंत मेरा,
या होगी शुरवात नयी?
क्या होगा कल सवेरा,
या अमावस रात वही?

मुझे जानता है क्या लेखक,
या नही वो मुझसे अलग?
क्या गुज़री है उस पर भी,
जो मैंने भी ज़िंदगी में सही?

कैसे वो किरदार,
मेरे अनुभव से सीख लेता है?
मुझे उसकी आँखों से,
गलती करते देख लेता है?

मैं मूक रह जाता हुँ,
जब कभी दोहराता वही कर्म।
अपने आप मे लजाता,
खुद को बदलने में लग जाता हूँ।

बचपन मे पढ़ा था,
कहानी से हमे शिक्षा मिलती है।
जो शिक्षा दे कहानी वही है।

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कल्पना

​आसमान क्या पेड़ है कोई,

                    जिसके तारे जैसे फल।

लटके रहते जो शाखों पर,

                    टीम-टीम करते रात -भर।

कोई छोटा कोई बड़ा है,

                    चमक भी सबकी अलग -अलग।

पक कर गिरते है ये कैसे,

                    बाग कहा जहा होते ढ़ेर।

मन ये मेरा सोचें कितना,

                    पूछे बच्चों जैसे प्रश्न।

बैठ कल्पना के घोड़े पर,

                    खोजे रे घन -घोर रहस्य।

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मजदूर

1 मई, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस जो लगभग एक सदी पहले से मनाया जा रहा है पर आज भी मजदूर की हालत जस की तस है। उसके अधिकारों के लिये कोई नही लड़ रहा। वह खुद परिस्थितियों से जूझ रहा है।

उसकी कुछ मजबूरियाँ जो मैंने महसूस की अपनी इन पंक्तियों में व्यक्त करने का प्रयास किया है

मजदूर, बड़ा मजबूर
दिहाड़ी के भरोसे रोटी दो जून*
हर सुबहा संशय से भरपूर
क्या आज मिलेगी
के सोएंगे बच्चे संग भूख

तत्पर करने को हर संभव काम
ढ़ोना हो बोझ
के खोदना हो पहाड़
किसीं भी तरह की मेहनत
उसके लिए जीवन की कसौटी है

सुनता हर किसी की
सिर्फ मेहनताने को देख
जो मिटाता बच्चो की भूख
कमाता चंद रुपये
आत्म-सम्मान अपना बैच
मजबूरी के सामने बिल्कुल चुप

मजदूर, बड़ा मजबूर
आसमानी छत के नीचे
तपती ज़मी का बिछोना
यही है उसका अपना घरोंदा
और समाज का व्यहवार ऐसा
की जैसे हो अछूत

मजबूरी भी बड़ी मजबूर
रोज लेती इम्तेहान
उसी का जो कल ही गुजरा
इन काटो भारी राहों से हुज़ूर
मजदूर, बड़ा मजबूर।

*दो जून -> दो वक्त।

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कोई…

तन की सुंदरता के पीछे मन का मेल छुपाये कोई,
नैन-नक्ष पर मोहित होते मन के भाव न देखे कोई,
छल-कपट से भरे हुए जो होते है संसार में कोई,
सगा-पराया कुछ न देखे स्वार्थ के आगे बचे न कोई,

मंशा अपनी पूरी करने निकले है जो नींद में सोये,
कितनो के संसार उजाड़े फिर भी जो जागे ना कोई,
ऐसे-वैसे जग में अनेकों भरे हुए है भीड़ में कोई,
बच कर रहना इनसे यारों डस ना ले आस्तीन में कोई,


पहचान क्या इनकी तुम्हे बताये मक्खन मलते मिले जो कोई,
शुभचिंतक का स्वांग रचाये ढ़ोंग करे संसार में कोई,
एक नहीं व्यक्तित्व किसी का यह तो पूरी जात है कोई,
वेश धरे जो सज्जनता का कर्म करे चांडाल के कोई ।

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दर्द

पिछले कुछ समय से दर्द के साथ समय बिताते हुए उसके भिन्न-भिन्न पहलुओं को एक दर्द निवारक मल्हम के विज्ञापन व हास्य रस के दिवंगत श्रेष्ठ कवि पंडित ओम व्यास जी की रचना से प्रेरणा लेकर अपनी इन पंक्तियों में दर्ज करने का प्रयास किया है।

दर्द श्वेत है, दर्द श्याम है

दर्द हरा पड़ा चौट का निशान है

दर्द पीड़ा है, दर्द कराहना है

दर्द मीठा है, चिठा चाशनी के सामान है

दर्द प्रेम है, दर्द विरह है

दर्द विफल प्रयास का परिणाम है

दर्द कंकड़ का कलेवा है

दर्द भूखे का हलवा है

दर्द छलावा है, धोखा है

दर्द परिस्थिति से मुंह मोड़ना है

दर्द चौट है, घाव है

दर्द मरोड़ है, मांसल खिंचाव है

दर्द ज़िद है, परेशानी है

दर्द कविता है, कहानी है

दर्द व्यंग है, दर्द व्यायाम है

दर्द व्यायाम से आराम है

दर्द बिस्तर है, एक करवट की नींद का नाम है

दर्द छुट्टी है, काम से विश्राम है

दर्द के नाम से दर्द बदनाम है

दर्द भगवान का स्मरण है

दर्द हर दूसरी दुआ का कारण है

दर्द प्रार्थना है, दर्द दूर से प्रणाम है

दर्द के आगे हर कोई धड़ाम है

दर्द की महिमा अपरंपार है

दर्द बिना जीवन दुश्वार है

दर्द को दंडवत प्रणाम है

ऐसा कोई अंग हो नहीं सकता

जिसमे दर्द हो नही सकता

दर्द जैसा कोई और हो नहीं सकता

दर्द कैसा भी हो, पराया हो नहीं सकता ।

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